Shri Shri 108 Sant Baba Sunder Singh Ji
 
 
१०८ श्री संत बाबा सुन्दर सिंह जी महाराज बेदी कुलभूषण गुरुद्वारा कीर्तनगढ़ अलीबेग(जम्मू) आप जी का जन्म 1887 महीना अनुमानित नवम्बर संवत विक्रमी 1944 महीना कार्तिक शुक्ल पक्ष है l इनके पिता का नाम बाबा जवाहर सिंह जी बेदी एवं माता भागवंती जी के कोख से बाबा फ़कीर चंद की कोठली सिआलकोट (पाकिस्तान) में हुआ l बाबा जी के पिता जवाहर सिंह जी बाबा जी के जन्म से चार महीने पूर्व ही स्वर्ग सिधार गए l माता जी की देख रेख में बाबा जी का पालन पोषण हुआ l बचपन में ही आप वाहेगुरु की लिव में मग्न रहते l पांच वर्ष की आयु में ही आपने अपने ताया जी विशन सिंह जी से पांच ग्रन्थ का पाठ सीखा एवं हर समय पाठ करते रहते एवं भक्तों की साखियाँ पढ़ते रहते एवं भोजन तक की सुध न रहती l माता जी जबरदस्ती भोजन खिलाती l बाबा जी में बच्चों वाली कोई भी आदते न थी l किसी भी वस्तु लेने के लिए न रोते न जिद करते l न ज्यादा किसी बात ही करते थे ताकि सिमरन में बाधा न आये |
12 साल की आयु में प्रभु से मिलने की चाह प्रबल हो गयी एवं बाबा जी ने घर से चले जाने का फैसला कर लिया l एक - दो वस्त्र एवं छोटी पोथी साहिब लेकर आधी रात को जब सब सो रहे थे माता जी को नमस्कार कर के घर से निकल पड़े l एवं चलते चलते पिंड (गाँव) आवनूर जो कि जम्मू रियासत काशमीर का प्रसिद्द शहर है पहुँच गए l दरिया के किनारे बैठ गए और भक्ति में लीन थे कि एक पुरुष बाबा दीदार सिंह के वचन कानो में पड़े बालक जी आप इतने सुन्दर, पवित्र आत्मा, मोहनी सूरत कौन हो ? कहाँ से आये हो ? बाबा जी के बताने पर कहा उन्होंने कहा आप चाहे तो मेरे घर में रहकर भजन- बंदगी करो l आप के कार्य में कोई बाधा नहीं आएगी |
बाबा दीदार सिंह जी गुरुओं के अंश से थे l पर उनकी कोई संतान न थी l इस प्रकार बाबा दीदार सिंह जी बाबा सुन्दर सिंह को लेकर पिंडो (गांवों) में एवं फिर अलीबेग पहुंचे l अलीबेग का इलाका हरा - भरा एवं रमणीक होने के कारण बाबा जी का मन यही लग गया l बालक बाबा सुन्दर सिंह जी आशीर्वाद के से बाबा दीदार सिंह जी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ |
अलीबेग में गुरूद्वारे नहीं थे l श्री संत की प्रेरणा से वहाँ गुरूद्वारे तैयार हो गए, गुरु ग्रन्थ साहिब जी के प्रकाश हो गए l सुबह- शाम वहाँ सत्संग होने लगा l बाबा सुन्दर सिंह जी का जन्म कस्तूरी की तरह संसार में फ़ैल गया l अब साधुओ- संतो की भीड़, यात्रियों की भी भीड़ यहाँ लगने लगी l बाबा जी इनके लिए लंगर बनाते, खिलाते जूठे बर्तन मांजते उनसे मीठी- मीठी बातें करते क्योंकि यह पूरन पुरुष की पहचान होती है |
संत बाबा सुन्दर सिंह जी को गुरुद्वारा छोटा लगने लगा एवं उन्होंने डेरा स्थापित किया जहाँ साधु- संत आराम से रह सकें एवं उनकी भक्ति में कोई बाधा न आये l उन्हें सत्संग मिले, नाम का रंग मिले l अनाथ बच्चों के लिए अनाथालय खोले जहाँ यतीम बच्चों को सहारा, प्यार मिले l उनकी सब आवश्यकताएं पूरी की जा सकें l गरीब बच्चों को शिक्षा दी जा सके l बुरे करमों से उन्हें बचाया जा सके l शुरू इतिहास से वाकिफ कराया जा सके l वृद्धों के लिए वृद्ध आश्रम खोले l जहाँ पर घरों से निकाले गए वृद्धों को सहारा मिलता था l उनके खान- पान, उनकी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती थी l दवाइयां आदि निःशुल्क दी जाती थी |
अंधे, लूले- लंगड़ों के लिए भी रहने की व्यवस्था की गयी l इनके लिए ज्ञान की व्यवस्था, कीर्तन सिखाने की व्यवस्था, रोजी- रोटी कमाने के योग्य बनाने के लिए कई स्कूल खोले l धार्मिक शिक्षा देने की व्यवस्था भी बाबा जी ने की l गुरु ग्रन्थ साहिब में 31 राग- रागनियों का विवरण किया गया है l उन रागों की शिक्षा भी दी जाती थी l गुरमति संगीत की शिक्षा देने की भी शुरूआत हो गयी |
ऐसे गुरुद्वारा भी साहिब ने बनवाए जहाँ 101 श्री अखंड पाठ साहिब पाठ की सचखंड की लड़ी एक साथ हो सके जो सचखंड (स्वर्ग) का नजारा देते हों l जहाँ कीर्तन की धुनें गूंजे l गुरु के लंगर में मंगतों के अलावा कुत्तों को 'भला लोग' कह कर पुकारा जाता था उन्हें लंगर छकाया जाता था l बिल्लियों को दूध- चूरी, पक्षियों को दाना, कीड़े मकोड़ों के खाने की भी व्यस्था थी l वो बूढी गाय जो दूध नहीं देती थी जिन्हें लोग कसाइयों के हाथ बेच आते थे बाबा जी उन्हें खरीद लाते थे अपनी गऊशाला में रखकर उनकी सेवा करते थे बाबा जी ने एक गुरुनानक दवाखाना भी खोला था जहाँ हर मर्ज की दवा लोगों को दी जाती l बाबा जी ने एक गुरुनानक मोदी खाना भी खोला जिसमे वस्त्र, खाने का सामान- बादाम, इलायची, मखाने, गुड, शक्कर, देशी घी, सूजी, मैदा, साबुन, तेल, अमृतधारा, अजवाइन, काला नमक, गेरू, फिटकरी, जो कोई सामान मांगता मिल जाता था l लंगर के लिए बर्तनों की भी व्यस्था थी l हर तरह के छोटे- बड़े बर्तन लंगर में मिल जाते थे l
उनके महान वयक्तित्व की प्रतिष्ठा में कानपुर नगर के मध्य भाग के एक विस्तृत क्षेत्र का नाम सुन्दर नगर रखा गया है |
संत बाबा सुन्दर सिंह जी के दो चेले थे |
(1) संत बाबा निहचल सिंह जी - जिनको कथा करने का वर प्रदान किया l जिनका डेरा जगादरी में है जो क़ि डेरा संतपुरा के नाम से जाना जाता है l संत निहचल सिंह जी इस समय नहीं हैं वह भी स्वर्ग सिधार चुके हैं |
(2) संत बाबा मोहन सिंह जी - जिनको कीर्तन का वर प्राप्त था जिनको संत बाबा सुन्दर सिंह जी ने कीर्तन सिखवाया था l इन्होने अपना डेरा कानपुर में स्थापित किया था जोकि गुरुद्वारा कीर्तनगढ़, गुमटी न० पांच में है l सन् 2003 में 27 मार्च को बाबा मोहन सिंह भी गुरपुरी सिधार गए l लेकिन आज भी गुरुद्वारा गुमटी में वही प्रथा प्रचलित है जो बाबा जी के समय में थी l